ऋषि-पंचमी की कथा, पूजन,
भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि-पंचमी कहते हैं। यह व्रत प्रायः स्त्रियों का है। किसी-किसी दशा में पुरुष भी अपनी स्त्री के लिए इस व्रत को कर सकता है।
व्रत करने वाली स्त्री को चाहिए कि वह भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मध्याह्न के समय स्वच्छ जलवाली नदी या ताल पर जाकर प्रथम १०८ अथवा ८ अपामार्ग की दातुन करे और फिर मृत्तिका-स्नान के पश्चात् पंच-गव्य पान करे । पुरुष हो तो हवन करके पंचगव्य पान करे। स्त्री हो तो केशव आदि विष्णु के नामों को जपकर पंचगव्य ले । तत्पश्चात स्नान करके प्रथम अपना नित्य-कर्म करे। इस विधि से स्नान करके, घर पर उपवास करनेवाली स्वयं अपने हाथ से पूजा के स्थान को गोबर से चौकोर लोपे । फिर उसी पर अनेक रंगों से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर मिट्टी अथवा तांबे का घड़ा उस पर रक्खे। और उसको गले तक कपड़े से ढक दे । घट के ऊपर तांबे अथवा बांस के पात्र में जौ भरकर और उसमें पंच-रत्न, फूल गन्ध और अक्षत रखकर वस्त्र से ढंक दे। उसी स्थान पर अष्ट-दल कमल लिखकर सप्त ऋषियों की पूजा करे। आवाहन से लेकर ताम्बूल पर्यन्त षोड़शोपचार से पूजन करने के अनन्तर पूजा का पक्वान्न ब्राह्मण को दान करे और आप ऋषि-अन्न का भोजन करे ।
पहली कथा - विदर्भ देश में उत्तङ्क नामक एक ब्राह्मण रहता था । उस ब्राह्मण के घर में केवल दो संताने थीं- एक कन्या और एक पुत्र । पुत्र परम्परागत संस्कारों के कारण थोड़ी ही उम्र में सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों का ज्ञाता हो गया था । यद्यपि उसकी बहन भी बहुत सुशीला थी और अच्छे कुल में ब्याही थी । तथापि किसी पूर्व पाप के कारण वह विधवा हो गई थी। उसी दुःख से संतप्त वह ब्राह्मण अपनी स्त्री और कन्या-सहित गंगा के किनारे वास करने लगा और वहाँ धर्म-चर्चा करते हुए समय बिताने लगा । कन्या अपने पिता की सेवा-सुश्रूषा करती थी और पिता अनेक ब्रह्मचारियों को वेद पढ़ाता था। एक दिन सोती हुई कन्या के शरीर में अकस्मात कीड़े पड़ गये। कन्या ने अपनी दशा देखकर माता से कहा । माता ने कन्या के इस दुःख से दुःखी होकर बहुत पश्चाताप किया और उसने पति को सब वृत्तान्त सुनाकर इसका कारण पुछा ।
उत्तङ्क ने समाधिस्थ होकर इस घटना के कारण पर विचार किया और स्त्री को उत्तर दिया कि पूर्व-जन्म में यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला अवस्था में अपने बरतनों का स्पर्श किया था। इसी पाप के कारण इसके शरीर में कीड़े पड़ गये हैं। धर्मशास्त्र में लिखा है कि रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डालिनी के समान, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान और तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र रहती है। चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। इसके अतिरिक्त इस कन्या ने इसी जन्म में एक और भी अपराध किया है। वह यह कि इसने स्त्रियों को ऋषि-पंचमी का व्रत करते देखकर उनकी अवहेलना की है। अतः इसके शरीर में कीड़े पड़ने का एक यह भी कारण है। उक्त व्रत की विधि को देखने के कारण ही इसने ब्राह्मण-कुल में जन्म पाया है, 'अन्यथा यह चाण्डाल के घर में जन्म लेती । ऋषि पंचमी का व्रत सब व्रतों में प्रधान है, क्योंकि इसी के प्रभाव से स्त्री सौभाग्य-सम्पन्न रहती है और रजस्वला होने की अवस्था में अज्ञानपूर्वक होनेवाले स्पर्शादि से मुक्त हो जाती है।
दूसरी कथा - सत्ययुग में विदर्भ देश में प्रसेनजित नामक एक राजषि राज करता था। उसके राज्य में वेद-वेदाङ्ग का ज्ञाता सुमित्र नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह खेती करके अपना निर्वाह
करता था। जयश्री नाम की उसकी स्त्री भी खेती के काम में उसकी सहायक रहती थी। किसी समय वह स्त्री भी रजोवती होकर अज्ञात अवस्था में गृहकार्य करती रही और ब्राह्मणों को भी स्पर्श करती रही । समय पाकर दैवयोग से उन दोनों का एक साथ ही प्राणान्त हुआ। दूसरे जन्म में स्त्री ने कुत्ती का जन्म पाया और ब्राह्मण ने बैल का । ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था। वह भी अपने पिता की तरह वेद-वेदाङ्ग का ज्ञाता तथा ब्राह्मण और अतिथि का पूजक था। उसके माता-पिता, कुत्ती और बैल योनि में उसी के घर में रहते थे। एक समय सुमति ने अपने माता-पिता का श्राद्ध किया। सुमति की स्त्री ने ब्राह्मणों के भोजन के लिए जो खीर बनाई थी, उसमें अकस्मात एक सर्प विष उगल गया । इस घटना को कुत्ती ने स्वयं देखा था। अतः उसने यह विचार कर कि इस खीर के खाने वाले ब्राह्मण मर जायंगे, खीर को छू लिया । इससे क्रुद्ध होकर सुमति की स्त्री ने कुत्ती को जलती हुई लकड़ी से मारा और उसने सब बरतन पुनः मांजकर फिर से खीर बनाई । जब सब ब्राह्मण भोजन कर चुके, तब उनका जो जूठन वचा, उसे सुमति की स्त्री ने पृथ्वी में गाड़ दिया। इस कारण कुत्ती उस दिन भूखी ही रही। बैल को सुमति ने हल में जोता था और उसका मुंह भी बांध दिया था, जिससे वह भो तृण नहीं चर सका। इन दोनों के भूखे रहने के कारण सुमति का श्राद्ध करना व्यर्थ ही हुआ। सुमति पशु-पक्षियों की भाषा समझता था । अस्तु, वह अपने माता-पिता की स्थिति को जानकर ऋषि-मुनियों के आश्रमों में गया और उसने उनसे अपने माता-पिता के पशु-योनि में जन्म पाने का कारण पूछा। ऋषियों ने उन दोनों के पूर्व-जन्म के पापों का हाल कह सुनाया और यह भी समझाया कि यदि तुम स्त्री-पुरुष दोनों ऋषि-पंचमी का व्रत करके विधिपूर्वक उद्यापन करोगे और उस दिन बैल की कमाई की कोई वस्तु न खाओगे तो अवश्य ही तुम्हारे माता-पिता की मुक्ति होगी। ऋषि-पंचमी व्रत में कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और सपत्नीक वशिष्ठ इन सात ऋषियों की पूजा करने का विधान है ।
सुमति ने माता-पिता की मुक्ति के लिए ऋषि-पंचमी का व्रत किया । अतः ऋषि-पंचमी के व्रत के कारण सुमति के माता-पिता मुक्ति को प्राप्त हो गये ।
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