संत नानक जी (जीवन परिचय)
'जिन लोगो ने सत्वगुणियों के परमाराध्य श्रीहरि को हृदय में धारण कर लिया है उन महात्मा साधुओ के लिये भला कौन-सा काम दुष्कर है और ऐसा फौन-सा त्याग है जिसे वे नहीं कर सकते है, वे सब कुछ त्यागने और करने में समर्थ है।'
- श्रीमद् भागवत
भारत देश आदि काल से तपोभूमि की सज्ञा से समलकृत होता चला आ रहा है। मध्यकालीन विश्व-इतिहास ने बहुत बड़े-बड़े सन्तो, दार्शनिको, कवियो और साहित्यकारो को जन्म दिया, उनमें सन्त नानक को एक विशिष्ट और परमोच्च स्थान प्राप्त है। वे निरकार, निरञ्जन, रोम-रोम में रमने-वाले और अलख सत्य-परमात्मा के स्मृतिकार थे। नानक ने हरि के नाम-जप को सर्वश्रेष्ठ धर्म स्वीकार किया। नानक ने सत्य का स्तवन किया। जीवमात्र की मौलिक एकता सिद्ध की। उन्होने सत्य और परमात्मा की अभिन्नता की ओर लक्ष्य किया। उनका आत्मबोध परमात्मा की ओर ले जाता है। उनकी आत्मा की वाणी का मीठा कंठ कह सका
'तुमरी उस्तुति तुम ते होई।
नानक और न जानमि कोई।'
नानक ने सत्य श्री अकाल, परमेश्वर के भजन को ही जीवन का परम ध्येय बतलाया। उनकी भारतीय शास्त्र की भगवदीय परम्परा में पूरी-पूरी आस्था थी। भारतीय इतिहाम की वे बहुत बड़ी आवश्यकता थे। दिल्ली की केन्द्रीय राजसत्ता नानक के प्राकट्य-काल में बाहरी आक्रमणों से क्षुब्ध और त्रस्त थी। नानक ने भयभीत जनता को सत्यनाम की महत्ता बताकर समाज का मौलिक ढंग से आध्यात्मिक संगठन किया। वे निर्गुण ज्ञान-धारा के सन्त थे, सन्तमत की पुष्टि कर उन्होने समाज मे चिन्मय सत्य-परम पुरुप परमात्मा की उपासना चलायी।
सन्त नानक ने सम्वत् १५२६ वि में वैशाख शुक्ल तृतीया को लाहौर के सन्निकट तलवण्डी ग्राम में जन्म लिया था, उनके जन्म-स्थान को नानकाना साहब भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम कालूचन्द था, वे पटवारी थे, माता का नाम तृप्ता था। नानक बचपन में ही ईश्वरोन्मुख थे, उनके संस्कार दिव्य और शुभ थे। उनके पिता उन्हे सांसारिक कार्यों में लगाना चाहते थे। उनकी शिक्षा का क्रम भी उन्होने कुछ सांसारिक ढंग पर ही रखना चाहा।
बचपन में पाठशाला में उन्होने अपने शिक्षागुरु से एक दिन कहा कि आप मुझे ऐसी शिक्षा दीजिये जिससे मेरा माया-बन्धन टूट जाय, में भगवान का भजन कर सकू और सांसारिक ज्वाला मुझे न सता सके। उनके शिक्षा-गुरु आश्चर्यचकित हो गये। नानक ईश्वर के चिन्तन, स्मरण और भजन में रात-दिन लगे रहते थे। घरवाले उन्हे ईश्वर से विमुख कर प्रपच में जकड़ने का साहस न कर सके। वे एकान्त में बैठ कर भगवान का घ्यान करते थे। एक दिन वे दोपहर तक घर न आ सके, लोग उनके लिये चिंतित हो उठे। पिता उनकी खोज में गये, घ्यान में लीन पाया, घर लाकर भोजन पर बिठाया पर उन्होने भोजन नहीं किया। उनकी बाहरी स्थिति विलक्षण देख कर पिता ने उन्हे स्वस्थ करने के लिये वैद्य बुलाया। कुछ चेत होने पर नानक ने वैद्य से कहा, "आप दवा देकर मुझे नीरोग तो करना चाहते है पर आपके भीतर काम, क्रोध, मोह, मद और मत्सर तथा लोभ आदि जो व्याधि है उनका उचित उपचार कर आपने अपने आपको स्वस्थ कर लिया है या नहीं।' वैद्य जी नानक की बात सुन कर अवाक हो गये। भवरोग के धन्वन्तरि के मध्यकालीन सस्करण के चरण पर मस्तक नत कर उन्होने नानक के घरवालो से कहा कि आप लोगो ने इस समय मुझे यहाँ बुला कर मेरा परम उपकार किया है। में जन्म-जन्म तक आप के आभार से दवा रहूँगा। आपके घर में असाधारण व्यक्ति ने जन्म लिया है। प्राणीमात्र के दुःख और कष्ट ने उन्हें चिंतित किया है। भगवान की उन पर महती कृपा है। मेरा तो उनके दर्शन मात्र से मोहान्धकार हट गया।
नानक में भत्तावारण पुरुप के लक्षण देख कर भी उनके पिता ने अपने प्यारे पुत्र को गृहस्थ के ही रूप में देखना चाहा। उनके मन ने कभी यह नहीं स्वीकार किया कि नानक घर त्याग कर सन्यासी हो जायें। उन्होने नानक को खेती करने की आज्ञा दी। नानक ने कहा कि मैंने जितनी धरती पर खेती की है वह तो बहुत लम्बी-चौडी है, उसमें मैंने अपने इष्ट मन्त्र-सत्य नाम का बीज बोया है। जो फसल होगी उसका भण्डार अक्षय होगा। मेरी खेती में जो रत्न फलेगे केवल उनकी प्राप्ति से ही जीवमात्र के इह लोक और परलोक दोनों सुधर जायेंगे। प्राणीमात्र अनन्त शान्तिमय जीवन के भागी होगे। वे परमेश्वर की भक्ति-भागीरथी में स्नान कर संसार में सत्य-दान की महिमा प्रतिष्ठित करेंगे। नानक के कथन से पिता को विशेष सतोष न हुआ। वे यही चाहते थे कि पुत्र सांसारिक यश और सम्पत्ति की अभिवृद्धि करे। उन्होने नानक को दूकानदारी की सीख दी और परदेश में सौदा खरीदने के लिये भेजना चाहा। नानक ने विनम्रता-पूर्वक कहा कि इस ससार में चारो ओर मेरी ही दूकानें है, सन्तजन स्थान-स्थान पर हरिनाम का सौदा कर रहे हैं। मेरी दूकान में सांसारिक वस्तु नहीं मिलती है, उसमें तो मैंने यत्नपूर्वक सारवस्तु का संचय किया है। उसमें वस्तु खरीदने वाले स्वर्ग और परमात्मा का योग पाते हैं, आत्मतत्व समझने वाले ही सारवस्तु-सत्यतत्व के ग्राहक है। पिता के बार-बार अनुरोध करने पर नानक ने कुछ रूपये लेकर विदेश की यात्रा की। उन्होंने इस कार्य में परमेश्वर की पवित्र प्रेरणा का दर्शन किया। मंगलविधान देखा। उनके साथ वाला नामक नौकर गया था। रास्ते में एक जगल में कुछ सन्तो की मण्डली देखी। नानक का नवनीत के समान हृदय पिघल गया। उन्होने सारे रुपये सन्तो की सेवा में लगा कर घर की राह ली। पिता उनके इस आचरण से खिन्न और अप्रसन्न हुए। नानक की बहन उन्हे ससुराल ले गयी। नवाब की राजसभा में उनकी नियुक्ति हुई। कुछ दिनों के बाद नानक ने नवाब की नौकरी छोड़ दी। उनके हृदय में तो परमात्मा के चरण-चिन्तन का भाव उदय हो चुका था। नवाब उनके उच्च चरित्र और आचार-विचार में बहुत प्रभावित था पर नानक ने परमेश्वर की राज-सभा को छोडना अपने लिये हितकर नहीं समझा। उन्नीस वर्ष की अवस्था में गुरदासपुर जनपद के मुलानामक व्यक्ति की कन्या सुलक्खनी देवी के साथ उनका विवाह कर दिया गया, इस प्रकार नानक ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया, उनके दो पुत्र श्रीचन्द्र और लक्ष्मीचन्द्र हुए। श्रीचन्द्र उदासी महात्मा थे उन्होने उदासी सम्प्रदाय के सिद्धान्तो की प्राणप्रतिष्ठा की। नानक दृढ सयमी, अध्यवसायी और मेघावी थे। उनका मन गृहस्थाश्रम में तनिक भी नहीं लगता था। उनमें घर के प्रति तनिक भी आसक्ति नही थी। वे अपने दो सेवक वाला और मरदाना को साथ लेकर प्रभु-भक्ति के प्रचार के लिये निकल पड़े। वाला उनकी सेवा करता था और मरदाना ईश्वर के अत्यन्त मधुर गुणगान से उन्हें सदा प्रसन्न रखता था। नानक ने निराकार, निरञ्जन अलख ब्रह्म से नाता जोड़ा, उन्होंने अमूर्त तथा निर्गुण ब्रह्म की भक्ति निभाने की सीख दी। उन्होने कहा कि निराकार प्रभु की पूजा से ही मोक्ष प्राप्ति हो सकती है। नानक ने गोरख, नामदेव और कबीर की निराकार-उपासना की परम्परा को प्रगति दी। लोग उनके उपदेश और वेश से प्रभावित हुए। इस ऐतिहासिक यात्रा में उनके सिर पर कलन्दरी टोपी या पगडी रहती थी। ललाट पर केसर का तिलक लगाते थे, गले में माला सुशोभित रहती थी, शरीर पर लाल या नारंगी रंग का परिधान रहता था। वे इस यात्रा में अमर योगी भर्तृहरि के आश्रम पर भी गये थे। हठयोगी भर्तृहरि से नानक ने कहा कि मनुष्य की रक्षा के लिये भगवान ने भक्तियोग का विधान किया है। भक्ति-मार्ग पर चलने से प्राण सरस हो जाता है, भक्ति ईश्वरीय देन है, अमृतमयी गंगा जी भी इनकी स्पर्धा के लिये प्रयत्नशील रहती है, जीवन समुज्ज्वल, सरस और मधुर हो जाता है, भगवान की भक्ति निरन्तर उनके नाम का चिंतन करने से मिलती है। इसकी प्राप्ति के लिये सचेष्ट रहना ही श्रेय मार्ग का अवलम्बन है। भर्तहरि के आश्रम से वे विश्वम्भरपुर नगर में पहुँचे। इस स्थान का प्रसिद्ध व्यापारी उनका शिप्य हो गया। ऐसा कहा जाता है कि विश्वम्भरपुर में नानक के पास एक हीरा था। नानक ने वाला को उसका मूल्य लगाने के लिये बाजार भेज दिया। सालसराय नामक व्यापारी ने सौ रुपया वयाना देकर हीरे का मूल्य पूछा। नानक ने कहा कि सालसराय इसे नहीं खरीद सकता है और वयाना लौटा दिया। व्यापारी पर इस घटना का बड़ा प्रभाव पड़ा, वह उनके दर्शन के लिये आया और दीक्षित हो गया। विश्वम्भरपुर से नानक मक्का और मदीना गये। इन स्थानो में उन्होने अद्भुत चमत्कार दिखाये । कावे की ओर पैर फैला कर सोने पर कुछ लोगों ने उन्हें झिड़की दी। उन्होंने पैर घुमा लिये, काबे का दरवाजा भी पैर की ओर घूम गया। लोगो ने उन्हे सिद्ध सन्त समझ कर अच्छी तरह स्वागत-सत्कार किया। उसके बाद सैदपुर में बावर के सैनिको ने उनको बन्दी बना लिया। बावर ने दैवी सिद्धि से प्रभावित होकर उनको मुक्त कर दिया। वगदाद और काश्मीर होते हुए वे दरवलोत स्थान पर आये, मरदाना का देहावसान हो गया। अजोधन पाकपत्तन में सन्त फरीद द्वितीय से भी उनकी भेंट हुई थी। नानक यात्रा से लौट कर गेरुआ वस्त्र धारण कर करतारपुर में घर वालों के साथ अठारह साल तक रहे, वैराग्य अधिक होने पर वे प्रयाग, काशी आदि तीर्थों मे होते हुए जगन्नाथपुरी में आये। पुरी में उनके बहुत से लोग शिप्य हो गये। जिस समय पुरी में जगन्नाथ जी की आरती हो रही थी वे उसे बाह्य आडम्बर समझ कर बाहर ही खड़े रहे, प्रभु के ध्यान में मग्न होकर उन्होने अपनी पवित्र वाणी से भगवान की दिव्य आरती उतारी। उन्होने गाया
गगनमय थाल रविचन्द दीपक बने
तारक मण्डल जनक मोती ।
धूप मलयानिलो पवन चंवरी करे
सकल वनराई फूलन्त जोती ।
कैसी आरती हो भवखण्डना तेरी,
आरती अनहता शब्द वाजन्त भेरी।
महस तव नैन तव नैने हरि तोहि कोउ
सहम मूरत मना, एक तोही।
सहस पद विमल तव एक पद गंध विन
सहस तव गन्ध इव चलत मोही।
सब मह जोति जोति है सोई
तिम दे चानण सब मह चानण होई।
गुरु साखी जोति परगट होई,
जो तिस भावे सो आरती होई।
हरिचरण कमल मकरन्द लोभित मनो,
अनदिनो मोही आहि पियासा ।
कृपा-जल देह नानक सारिंग कह
होइ जाते तेरे नाइ वासा ।
पुरी से लौटते समय दिल्लीश्वर बाबर ने उनका सत्संग लाभ किया था। बाबर ने उनको पर्याप्त पुरस्कार देना चाहा पर सन्त नानक तो परमात्मा की राजसभा के सदस्य थे, उन्हें इस लोक-व्यवहार से क्या करना था। उन्होंने बाबर को सदुपदेश दिये ।
नानक ने आत्मतत्व की साधना को ही सत्यनाम-कर्ता पुरुप की उपासना का रूप दिया। उनका सत्य अकाल, निविकार और सर्वया निर्भय है। सन्तों के सत्य का यही रूप होता है। नानक ने वैदिक सत्य की महिमा का विवरण मध्यकालीन भारत को सरस उपासना की वाणी में दिया था। शकराचार्य के वेदान्त से भारतीय मस्तिष्क उपराम होना चाहता था, इसलिये उन्होने उसका दरवाजा खटखटाया। निर्गुण और सगुण भक्ति का भारतीय जनता ने सहारा लिया। संतों और भक्तो का अनुसरण किया। नानक ने कबीर और रैदास की तरह समाज को निर्गुण भक्तिधारा का रसास्वादन कराया। उन्होंने कहा कि ईश्वर सम्राटो के सम्राट है, उनका ऐश्वर्य पूर्ण रसमय है उन्होंने कर्ता पुरुष की स्तुति में कहा
'केते गावण हारे,
गावहि तुहिनो, पवणु पाणी वैसतरु गावै राजा घरम दुआरे । गावहि चित्तगुपुत लिखि जाणहि लिखि लिखि घरमु वीचारे । गावहि ईसरु बरमा देवी सोहनि सदा सवारे। गावहि इन्दासणि बैठे देवतिआ दरि नाले, गावहि सिद्ध समाधी अन्दरि गावनि साथ विचारे।'
नानक उच्च कोटि के महात्मा और भगवद्भक्त थे। वे किसी नवीन मत या सम्प्रदाय का प्रवर्तन नहीं करना चाहते थे। उनके शिष्य 'सिख' कहलाते थे। नानक ने रात के पिछले पहर ईश्वर-भजन गाने की प्रथा चलायी थी। नानक ने ऐसे हरि की लीला का रसा-स्वादन किया जिनका गुणगान सन्तजन आदि काल से करते चले आते हैं, सिद्धजन समाधि में जिनके चैतन्य स्वरूप का प्रकाश अपनाते रहते है। नानक का देश सारा विश्व था, उनका परिवार चराचर जगत था, उनका ईश्वर-विश्वास सत्य की विजयिनी पताका का प्रश्रय था। शकराचार्य का आत्मतत्व चेतनाप्रधान ज्ञानयोग का स्रष्टा था तो नानक का आत्मबोध भावनाप्रधान भक्तिमूलक कर्मयोग का दिव्य और ईश्वरीय भोग का हरि की ऐश्वर्य-माधुर्य-लीला का नियामक था। पहले ने माया को ईश्वर से अलग कर वेदान्त का आत्मवाद सिखाया तो दूसरे ने माया को ईश्वर के वन्धन में सम्मोहित कर निर्गुण भक्ति-आत्मोपासना सिद्ध की। दोनो ज्ञानी थे, दोनो भक्त थे पर अन्तर केवल इतना ही था कि आचार्य शकर दार्शनिक थे और नानक सन्त थे। नानक निर्गुण परमात्मा के ऐश्वर्य और माधुर्य के मध्यकालीन समन्वय-सूत्र थे। निर्गुण और सगुण भक्ति ने उनके सत्य से प्राणमयी सजीवनी शक्ति की गगा में स्नान किया, सत्य के रमणीय शिव से ज्ञान के कैलाश पर अपने प्रणय का प्रमाणपत्र प्राप्त किया। भारत को नानक की यह मौलिक देन है। नानक कवीर के पूरक थे। उन्होने राष्ट्रीय सस्कृति दी।
नानक ने सीख दी कि हरि-सत्य का भजन करने वाले ही जगत की स्तुति और सम्मान के पात्र है। सत्य की शक्ति के सामने नास्तिक को भी नतमस्तक होना पड़ता है-उनकी यह मान्यता थी। नानक के सत्य ने आत्मप्रेम दिया, विश्व-वन्धुत्व दिया। नानक ने मानवता के पूर्णतम विकास पर ईश्वरीयता की अभिव्यक्ति निश्चित की। नानक युगपुरुप थे, उन्होने जनभाषा में समाज को सत्यानुराग और ईश्वर-प्रेम की शिक्षा दी। उन्होने कहा कि सत्य नाम का व्यवहार ही लोक-व्यवहार में सच्चा सहायक है, हरि के गुणगान से दैन्य भाग जाता है, दुख मिट जाता है, हरि का स्वरूप-चितन प्राणिमात्र की सेवा का पाठ पढाता है, सेवा-दान मानव को देवता बनाता है।
हरि की कृपा और प्रसाद से प्राप्त नरदेह का उपयोग नानक ने भगवान के स्मरण, ध्यान चिंतन और भजन में स्थिर किया। नानक ने ईश्वर के आदेश से दिव्य पथप्रदर्शक के रूप में धरती पर जन्म लिया था। उनका समस्त जीवन ईश्वर के चरण पर समर्पित था। वे ईश्वरीय कृपा के मध्यकालीन प्रतीक थे। उन्होने काश्मीर से कामरूप तक के भूमिभाग में सत्य की पवित्र भक्ति उतारी, सन्तमत की सरस्वती में कलि के सतप्त प्राणियो का अभिषेक किया। नानक का प्राकट्द्ध समय की मांग के अनुकूल ही हुआ। नानक ने समाज के सिर से असत्य का बोझा उतार कर उसे सत्य का निर्मल बाना पहनाया। उन्होने निसंकोच कहा कि सत्य सापेक्ष, रूढिगत और सम्प्रदायगत नही हो सकता है। वह तो सर्वथा स्वतन्त्र, निरपेक्ष और निस्सीम है। उन्होने घोषणा की कि समस्त जीवों पर समान रूप से भगवान की कृपा दृष्टि रहती है। नानक ने ब्रह्म की अमृतमयी दृष्टि की ओर ध्यान आकृष्ट किया। सत्यपुरुप निरकार ही सद्गुरु है, उनके चरण में नित्य-निरन्तर कृपा की गंगा का रमण होता है, जीवात्मा विना ईश्वर की कृपा के रह ही नही सकता है-नानक की ऐसी दृढ मान्यता थी।
सन्त नानक ने करतारपुर मे स १५९५ वि में आश्विन शुक्ल दशमी को महाप्रस्थान किया । अन्तिम समय निकट जानकर उन्होने अपने विश्वासपात्र शिप्य लहिणा-को उत्तराधिकारी घोषित किया। गुरु अगद के रूप में उनके प्रति सम्मान प्रकट किया । नारियल और पैसो की भेंट कर दूसरो के लिये अपने आचरण का आदर्श रखा। अन्तिम समय में गुरु नानक एक वृक्ष के नीचे जा वैठे, उनका मुखमण्डल दिव्य तेज से आलोकित था, नयनो मे शान्ति थी, मन में आनन्द था। कीर्तनमण्डली झूम झूम कर सरस भक्तिमय पद गा रही थी। 'जपु' जी का पाठ हो रहा था, पाठ की समाप्ति के थोडे समय पहले सन्त नानक ने चादर ओढ ली, 'वाह गुरु, वाह गुरु' का उच्चारण करते-करते वे परमात्मा में लीन हो गये। सारे वातावरण में जपु साहव की यह वाणी गूज उठी कि एक जीभ के स्यान पर यदि मेरी लाख जीभ हो जायें और लाख से वीस लाख हो जायें, एक एक जीभ से में लाख-लाख वार जगदीश्वर का ही नाम जपूगा। इस प्रकार स्वामी-परमात्मा के मार्ग की सीढियो से चढ कर उनमें लीन हो जाऊँगा ।
नानक भगवद्भक्ति के बहुत बड़े प्रचारक थे। उन्होने अपने समकालीन समाज को जागृत किया और कहा कि जब सबसे पहले और कुछ भी अस्तित्व में नही था तब केवल सत्स्वरूप परमात्मा ही थे, अब भी सत्य है और आगे भी सत्य रहेगा। नानक ने दुखी जीवो को सन्देश दिया कि परमात्मा सत्य है, उनका नाम भी सत्य है, उनके वखान करने के भाव अगणित है। अमृत वेला में-मगलमय प्रभात काल में उनके सत्यनाम और महिमा का विचार करना चाहिये । उनका समस्त जीवन ही एक यज्ञ था। वे असहाय और दीन जनता के सरक्षक थे, उन्होने सत्य, शान्ति और प्रेम का सन्देश दिया ।
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