चांदनी थी मगर चांद न था

मेरे जीवन की
अबूझ पहेली
मैं राही अनजाना सा मेरा पथ

थोड़ा ही कुछ समझ पाता, 
ज्यादा समझ ही न पाता 
मगर चलता हूँ।

कुछ खुशियों के दिन
बाकी सब लम्बी गम की रातें
होनी अनहोनी
मन के सुने आकाश में
 लगता था, 
 जैसे शंकाएँ भर गई हैं 
 और समाधान कहीं नहीं है।

 उन्हीं दिनो की 
 एक युवा शाम की बात है
 हल्की सर्दी थी
 शाम गहरी हो चली थी
 तारे दीख आए थे 
 रात अँधेरी थी, 
 लेकिन देखते-देखते
 आसमान पर 
 तारे ऐसे भर आए
 कि चाँद का न होना 
 पता ही न चला 
 चाँदनी तो थी, 
 मगर चांद नहीं था।
 
 
 अजब लगती थी
 बिना चांद के चांदनी
 आसमान पर वे अनगिन 
 नन्हीं-नन्हीं बिंदियाँ
 कभी वे छिप जातीं, 
 कभी मुस्करा जाती
मुझे समय का भान न था 
 जैसे कुछ और होने का भी 
 धीरे-धीरे भान न रहा। 
 हल्की ठंड थी और 
 हल्की-हल्की बयार 
 होते-होते सन्नाटा हो चला 
 जैसे बस तारों भरी रात ही थी 
 और उसके नीचे 
 चाँदनी में खिलता अँधेरा 
 और होले होले बहती हुई हवा 
 बाकी सब सो गया था ! 
 जैसे शेष हुआ अनहुआ हो गया हो।

पाँव मेरे चले जा रहे थे 
और समय निकलता जा रहा था
न मुझे चलते पांवों का पता था, 
न जाती घड़ियों का 
क्या मैं तब अपने में उलझा था ? 
घूमते-घूमते घण्टों की आवाज में 
दस सुनाई दिया, 
फिर ग्यारह सुनाई दिया। 
तारे आसमान में और भर आए थे 
जैसे वे उजले भी ज्यादा हो रहे हों 
एक-एक उनमें दुनिया है। 
कई सूरज हैं 
और सूरज से बड़े हैं 
जितने दिखते हैं असंख्य है
  सभी ये तारे दृश्य और अदृश्य 
  स्वतन्त्र जगत् हैं 
  और बड़े-बड़े जंगल हैं 
  और वे बराबर जागते हैं, 
  और घूमते हैं, 
  और ये अनन्त हैं, 
  अनन्तकाल से हैं, 
  अनन्तकाल तक हैं
  वे नन्हीं नन्ही बिन्दियों से तारे !

ऊपर उन्हें देखता, 
फिर नीचे 
अपने को देखता 
हठात् अपना होना 
न होना-सा लगता
इस न होने में जैसे मैं डूबने लगा
देखते- देखते मेरे प्रश्न खो गए, 
शंकाएँ बिसर गई
जाने किससे जी भर आया
भरके मैं इल्का हो गया
मेरे पैर अब चल नहीं रहे 
तैर रहे थे। 
मैं धरती पर न था 
जैसे एक साथ मैं आसमान में भी था 
उस समय चार बजे 
घण्टा एक-एक कर बजा गया
यह दो यामों का संधि-काल था
अभी भी तारे थे
चांदनी थी, मगर चांद न था।

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