माँ नर्मदा

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               माँ नर्मदा एक साहित्यिक प्रदक्षिणा
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           सब जानते हैं कि नदियों के किनारे ही अनेक मानव सभ्यताओं का जन्म और विकास हुआ है। नदी तमाम मानव संस्कृतियों की जननी है। प्रकृति की गोद में रहने वाले हमारे पुरखे नदी-जल की अहमियत समझते थे। निश्चित ही यही कारण रहा होगा कि उन्होंने नदियों की महिमा में ग्रंथों तक की रचना कर दी और अनेक ग्रंथों-पुराणों में नदियों की महिमा का बखान कर दिया। भारत के महान पूर्वजों ने नदियों को अपनी मां और देवी स्वरूपा बताया है। नदियों के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है, इस सत्य को वे भली-भांति जानते थे। इसीलिए उन्होंने कई त्योहारों और मेलों की रचना ऐसी की है कि समय-समय पर समस्त भारतवासी नदी के महत्व को समझ सकें। नदियों से खुद को जोड़ सकें। नदियों के संरक्षण के लिए चिंतन कर सकें। शायद इस हेतु ही आदि काल से ऋषि मुनियों, संतो और भक्तों द्वारा नर्मदा की प्रदक्षिणा की जा रही है।
     हिंदू पूजा पद्धति में देवी-देवता की परिक्रमा करने का विधान है। परिक्रमा, जिसे संस्कृत में प्रदक्षिणा कहा जाता है, इसे प्रभु की उपासना करने का माध्यम माना गया है। ऋग्वेद में प्रदक्षिणा के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। ऋग्वेद के अनुसार प्रदक्षिणा शब्द को दो भागों प्रा और दक्षिणा में विभाजित किया गया है। इस शब्द में मौजूद प्रा से तात्पर्य है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब चार दिशाओं में से एक दक्षिण की दिशा, यानी परिक्रमा का अर्थ हुआ दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी-देवता की उपासना करना। किसी के समग्र स्वरूप का दर्शन करना है। परिक्रमा का निवेदन है कि आप हम पर कृपा करें।
     विश्व में नर्मदा ही मात्र एक ऐसी नदी है जिनकी विधिवत व पूर्ण परिक्रमा की जाती है। यह परिक्रमा अमरकंटक या ओंकारेश्वर से प्रारंभ करके नदी के किनारे-किनारे चलते हुए दोनों तटों की पूरी यात्रा के बाद वहीं पर पूरी की जाती है, जहाँ से प्रारंभ की गई थी। व्रत और निष्ठापूर्वक की जाने वाली नर्मदा परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में पूरी करने का विधान है, परन्तु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरी करते हैं। आजकल सड़क मार्ग से वाहन द्वारा काफी कम समय में भी परिक्रमा करने का चलन हो गया है। अनुभव ले चुके लोगों के अनुसार परिक्रमा के दौरान जो आत्मिक व दैवीय अनुभूति होती है। इसका वर्णन कर पाना कठिन है। 
   धर्म, अध्यात्म और संस्कृति की प्राणवायु से सिंचित "भारत वर्ष" में तप और जप का अहम स्थान है। नर्मदा पदयात्रा एक ऐसा त्याग एवं तप उत्सव है, जो व्यक्तित्व को परिपूर्णता के साथ घड़ती है। जिसने भी नर्मदा की परिक्रमा पूरी कर ली उसने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा काम कर लिया। उसने मरने से पहले वह सब कुछ जान लिया, जो वह यात्रा नहीं करके जिंदगी में कभी नहीं जान पाता। 

  माँ नर्मदा के तट पर अनेक तीर्थ-स्थल ज्योतिर्लिंग, उपलिग आदि स्थापि हैं, जहाँ युगों-युगों से साधकों ने तपस्या और भक्ति से परम तत्व का अनुभव किया। इसके उद्गम स्थल अमर कंटक पर मेकल, व्यास, भृगु और कपिल आदि ऋषियों ने तप किया था। अमरकंटक से निकलते ही कपिलधारा और दूधधारा है, तो आगे मंडला की सहस्रधारा, बरमानघाटकी सतधारा, ओंकारेश्वर के पास धाराक्षेरु और महेश्वर के पास पुन: सहस्रधारा  कैसी धाराप्रवाह नदी है यह। इसकी धारा के विविध अलौकिक रूप सौंदर्य में खोकर एक परिक्रमा वासी देहि होकर भी वैदेही हो जाता है।     
      नर्मदा का पहला पड़ाव मंडला है, कहते हैं कि राजा सहस्रबाहु ने यहीं अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा के प्रवाह को रोकने का प्रयत्न किया था इसीलिए असका नाम 'सहस्रधारा' है। भेड़ा-घाट में भृगु ऋषि ने तप किया था, इन्होंने ज्योतिष ग्रंथ भृगु संहिता की रचना की थी। यहाँ थोड़ी दूर पर नर्मदा का एक 'धुआँधार' प्रपात है। इस के बाद साढ़े तीन किमी तक नर्मदा का प्रवाह दोनों ओर सौ-सौ फुट से भी अधिक ऊँची संगमरमरी दीवारों के बीच से सिंहनाद करता हुआ गुजरता है।
भेड़ा-घाट के बाद नर्मदा ब्राह्मण घाट, रामघाट, सूर्यकुंड और होशंगाबाद होते हुए नेमावर में विश्राम करती है। नेमावर नर्मदा की यात्रा का बीच का पड़ाव है, इसलिए इसे 'नाभि स्थान' भी कहते हैं। यहाँ से भडूच और अमरकंटक दोनों ही समान दूरी पर है। पुराणों में इस स्थान का 'रेवाखंड' नाम से कई जगह महिमामंडन किया गया ह धायड़ी कुंड नर्मदा का सबसे बड़ा जल-प्रपात है। यहीं पुनासा की जल विद्युत-योजना का बाँध तबा नदी पर बना है। 
 ॐकारेश्वर कहते हैं कि वराह कल्प में जब सारी पृथ्‍वी जल में मग्न हो गई थी तो उस वक्त भी मार्केंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता था। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ॐकारेश्वर में है। ॐकारेश्वर में ज्योर्तिलिंग होने के कारण यह प्रसिद्ध प्राचीन हिंदू तीर्थ है। सुदूर केरल से आकर बालक शंकर ने यहाँ गुरु गोविन्दपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। वे हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ परिव्राजक हैं। भारत की भावनात्मक एकता के लिए उन्होंने जो किया. वह अनुपम है। ऐसे आद्य शंकराचार्य को पावन स्मृति इस ओंकारेश्वर से जुड़ी हुई है। फिर कमलभारती जी. रामदासजी और मायानंदजी सदृश संतों के आश्रम भी यहां रहे। ॐकारेश्वर के आसपास दोनों तीरों पर बड़ा घना वन है, जिसे 'सीता वन' कहते हैं। वाल्मीकि ऋषि का आश्रम यहीं कहीं था।
मंडलेश्वर  विद्धानों का मत है कि मंडन मिश्र का असली स्थान यही है। फिर पहूँचते है महेश्वर जो कि प्राचीन माहिष्मती नगरी माना जाता है। महेश्वर से आगे खलघाट है। इस स्थान को 'कपिला तीर्थ' भी कहते हैं। कपिला तीर्थ से 12 किमी पश्चिम में धर्मपुरी के पास महर्षि दधीचि का आश्रम बताया गया है। स्कंद-पुराण और वायु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है।
धर्मपुरी के बाद कुश ऋषि की तपोभूति शुक्लेश्वर से आगे नर्मदा माता चिरवलदा पहुँचती हैं। माना जाता है कि यहाँ विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्री वसिष्ठ और कश्यप ने तप किया था।
शुक्लेश्वर से लगभग पाँच किलोमिटर बड़वानी के पास सतपुड़ा की घनी पहाड़ियों में बावन गजा में भगवान पार्श्वनाथ की 84 फुट ऊँची मूर्ति है। यह एक जैन तीर्थ है। बावन गजा की पहाड़ी के ऊपर एक मन्दिर भी है। हिन्दुजन इसे दत्तात्रेय की पादुका कहते हैं। जैन इसे मेघनाद और कुंभकर्ण की तपोभूमि मानते हैं।
बावन गजा के आगे वरुण भगवान की तपोभूमि हापेश्वर के दुर्गम जंगल के बाद शूलपाणी नामक तीर्थ है। यहाँ शूलपाणी के अलावा कमलेश्वर, राजराजेश्वर आदि और भी कई मन्दिर हैं।
शूलपाणी से आगे चलकर क्रमश: गरुड़ेश्वर, शुक्रतीर्थ, अंकतेश्वर, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ होते हुए नर्मदा अनसूयामाई के स्थान पहुँचती हैं, जहाँ अत्री -ऋषि की आज्ञा से देवी अनसूयाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया था और उससे प्रसन्न होकर ब्रहा, विष्णु, महेश तीनों देवताओं ने यहीं दत्तात्रेय के रूप में उनका पुत्र होकर जन्म ग्रहण किया था।
  आगे नर्मदा कंजेठा पहुँचती है जहाँ शकुन्तला के पुत्र भरत ने अनेक यज्ञ किए। फिर और आगे सीनोर, सीनोर के बाद भडूच तक कई छोटे-बड़े गाँव के बाद अंगारेश्वर में मंगल ने तप करके अंगारेश्वर की स्थापना की थी। कहते हैं कि अंगारेश्वर से आगे निकोरा में पृथ्वी का उद्धार करने के बाद वराह भगवान ने इस तीर्थ की स्थापना की। फिर आगे क्रमश: लाडवाँ में कुसुमेश्वर तीर्थ है। मंगलेश्वर में कश्यप कुल में पैदा हुए भार्गव ऋषि ने तप किया था।
   इसके बाद कुछ मील चलकर नर्मदा भडूच पहुँचती हैं, जहाँ नर्मदा समुद्र में मिल जाती है। भडूच को 'भृगु-कच्छ' अथवा 'भृगु-तीर्थ' भी कहते हैं। यहाँ भृगु ऋषि का निवास था। यहीं राजा बलि ने दस अश्वमेध-यज्ञ किए थे। भडूच पहुँचकर माँ नर्मदा समुद्र में मिल जाती है।
     मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी शिव पुत्री माँ नर्मदा मैकल पर्वत के अमरकंटक शिखर से प्रवाहित हो तीन राज्यों से गुजरती रत्नासागर में समाहित होकर अनेक जीवों का उद्धार करती है। नर्मदा सिर्फ एक नदी ही नहीं बल्कि अपने आप में सम्पूर्ण सभ्यता और संस्कृति है। जिस प्रकार राम की कथा उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ती है, कृष्ण की कथा पूर्व और पश्चिम भारत को जोड़ती है, उसी प्रकार नर्मदा भी देश को जोड़ने का एक सूत्र है। मनुष्य को विपन्न से संपन्न बनाने में सर्वाधिक योगदान नदियों का रहा है। नर्मदा भी करोड़ों वर्ष से अनवरत अमृत धार प्रवाहित करती आ रही है इसने अपने तटों पर अनगिनत सभ्यताओं का उत्थान एवं पतन देखा है। युगों-युगों से हमारी माटी को अपने अमृत-जल से सोना उपजाने योग्य बनाने और हमारे शुष्क कंठों की प्यास बुझाने वाली इस पवित्रतम नदी को हम युगों-युगों से पूजते आये हैं। इस दिव्य और रहस्यमय नदी की महिमा वेदों तक ने गायी है। मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है कि ‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती, परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।’ 
      पुराणों और धर्मशास्त्रों ने इसे भाव रूप में पापनाशिनी, पुण्यदायिनी, मुक्तिदात्री और पितृतारिणी कहा और भौतिक रूप में भक्तों की मनोकामनी पूर्ण कर जीवन में यश, जय और विजयदायिन कहा। 
   ज्योतिषाचार्य पं. अखिलेश त्रिपाठी के अनुसार नर्मदा विश्व की एक मात्र नदी हैं जिनका प्रवाह अन्य नदियों से विपरीत यानी पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह ढलान की जगह ऊंचाई की तरफ बहती हैं, जो लोगों को आश्चर्य चकित कर देती है। नर्मदा की इसी महिमा का प्रताप है कि इसके उद्भव से लेकर संगम तक करीब दस करोड़ तीर्थ स्थल हैं। माना जाता है नर्मदा ने जिस स्थान को भी अपना सानिध्य प्रदान किया वह तीर्थ संज्ञक हो गया है। ज्योतिष मर्मज्ञ रामसंकोची गौतम के अनुसार नर्मदा के अतिरिक्त केवल ताप्ती नदी ही पश्चिम की ओर बहती है एक वैज्ञानिक धारणा यह भी है कि करोडों वर्ष पहले ताप्ती भी नर्मदा की ही सहायक नदी थी। शोध के बाद कई वैज्ञानिक इस पर सहमत हुए हैं। 
    जेडीए अध्यक्ष डॉ. विनोद मिश्रा ने भी अपनी पुस्तक में नर्मदा परिक्रमा के अद्भुत अनुभवों को साझा किया है। रमनगरा निवासी वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य पं. मोतीराम शास्त्री की रचना पय: पानम् को राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। मनीषियों ने लिखा है कि नर्मदा का स्वरूप और आल्हादित करने वाला है। नर्मदा के कल-कल निनाद में शिवत्व का बोध होता है। नर्मदा की उछलती लहरों का नृत्य अंत:पुर के दरवाजों को खोल देता है। इसका आध्यात्मिक सुख अवर्णनीय है। वहीं भू-जल विद विनोद दुबे का कहना है कि नर्मदा जल में वैक्टीरिया को खत्म करने की अद्भुत शक्ति है। नर्मदा वैली में युगीन सभ्यता बिखरी पड़ी है। लोगों की इस पर नजर पड़े, वे इसके महत्व को समझें। संभवत: इसलिए ही नर्मदा परिक्रमा की परम्परा प्रारंभ हुई होगी। पाषाण में तब्दील हो चुके नर्मदा के किनारे पेड़-पौधों व पत्थरों के अलावा नर्मदा वैली के रहस्यों पर आज भी अनेक शोध चल रहे हैं।  
  बात जब नर्मदा परिक्रमा की हो और हम नर्मदा के समर्पित यात्री अमृत लाल बेगड़ जी की बात न करें तो यह परिक्रमा शायद अधूरी सी होगी। नर्मदा के सौन्दर्य ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि वो उसके किनारे-किनारे वर्षों तक पद-यात्रा करते रहे। इतने लंबे सफर में कितनी ही कहानियां, कितने ही दृश्य, कितने ही अनुभव सहेजे। और इस चित्रकार, कथाकार ने अपनी यात्राओं के स्वाद को सिर्फ अपने तक सीमित ही नहीं रखा बल्कि उन्होंने इसे अपनी तीन-​तीन किताबों में उन्हें उलीचता है। अद्‍भुत सौंदर्यवान नदी नर्मदा के उतने ही अद‍्भुत पदयात्री अमृतलाल वेगड़ की नर्मदात्रयी की तीनों किताबें ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ (1992), ‘अमृतस्य नर्मदा’ (1992) और फिर ‘तीरे—तीरे नर्मदा’ (2012) इस पहाड़ी नदी के सौंदर्य के साथ-साथ इसके तट पर बहते जीवन की अंतरंग झलक दिखाने के बहाने हिंदी यात्रा साहित्य को बेहद समृद्ध बना चुकी है। 
    कुछ दशक पूर्व की नर्मदा और अब की नर्मदा के बारे में बेगड़ जी अत्यंत व्यथित होकर कहते है कि " मैंने अपनी पहली किताब का नाम सौन्दर्य की नदी नर्मदा इसलिए रखा क्योंकि मुझे लगा कि इस नदी के जैसा सौन्दर्य तो कहीं हो ही नहीं सकता और दूसरी किताब का आरम्भ भी इस प्रार्थना को प्रथम पृष्ठ पर लिखकर किया कि नर्मदा तुम अत्यंत सुन्दर हो अपने सौन्दर्य का प्रसाद मुझे दो ताकि मैं उसे सब तक पहुंचा सकूँ। लेकिन कुछ समय पूर्व प्रकाशित अपनी तीसरी किताब के बारे में वो कहते हैं कि अब मैंने नर्मदा की जो दुर्दशा देखी है उसके बाद नर्मदा का सौन्दर्य तो छोड़िये  मुझे तो अकेले सौन्दर्य शब्द का उपयोग करने में भी डर लगने लगा है और इस किताब में मैंने इस शब्द के प्रयोग से स्वयं को यथासंभव दूर ही रखा है।"  
       निर्मल नर्मदा अविरल नर्मदा कैसे हो? नर्मदा हमेशा निर्मल रहे, अविरल रहे, इसके लिए जरूरी है कि कहीं भी नदी की धारा को पूरी तरह न रोका जाए। संतों ने जो सुझाव दिए उनके मुताबिक समन्वय-संवाद के साथ जागरूकता लाकर नर्मदा का संरक्षण किया जा सकता है।
 
 कैलाश मंडलोंई ‘कदंब’

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