वर्षा  रानी क्यों रूठी?

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              वर्षा रानी रूठ गई

 

     एक समय की बात है। किसी बात को लेकर वर्षा रानी रूठ गई और अपना रौद्र रूप धारण कर लिया। आसमान में घने काले-काले बादल छा गये। बिजलियाँ चमकने लगी। बादलों की गड़गड़ाहट से सभी के हृदय थरथराने लगे। पृथ्वी पर जगह-जगह भीषण वर्षा होने लगी। पशु-पक्षी, जीव-जंतु और मानव अपने प्राण बचने के लिए यहां वहां छिपने लगे। कुछ ही समय में सब तहस-नहस हो गया। हजारों मकान बह गए। सैकड़ों लोगों की जाने चली गई। फसल बर्बाद हो गई। पृथ्वी पर त्राहिमाम मच गया। 

    कुछ समय प्रश्चात जब वर्षा रुक गई और लोगों ने देखा कि आज वर्षा रानी ने बहुत नुकसान किया है। वे वर्षा रानी से बहुत नाराज हो गए। गांव के लोग इकट्ठे हुए और विचार किया कि वर्षा रानी ने हमारा बहुत नुकसान किया है। इनकी शिकायत भगवान से की जानी चाहिए। धरती के लोगों ने भगवान के पास वर्षा रानी की शिकायत कर दी।

    

               वर्षा रानी की सफाई

 

         भगवान ने वर्षारानी के खिलाफ धरती वासियों की अर्जी पढ़ी तो वे वर्षारानी के इस कृत्य पर बहुँत नाराज हुए। तत्काल उन्हें वहां की अदालत में बुलाया गया। लोगों द्वारा उनके खिलाफ सबूत पेश किए गए।और उन्हें मुजरिम करार दिया गया। जब सजा देने से पहले उनसे पूछा गया कि तुम अपनी सफाई में कुछ कहना चाहती होतब इतना सबकुछ होने के बाद भी, वर्षारानी ने भरी अदालत में अपने गुनाह को कबूल से इंकार कर दिया। और इसके लिए बादलों को जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे हर्जाने की भी मांग कर दी। उसने अपनी सफाई में कहा कि मुझे आसमान में सम्भालने की जिम्मेदारी बादलों की है। वे मुझे सम्भाल नहीं पाए। धरती पर मुझे थोड़ा-थोड़ा छोड़ने की बजाय बहुत ज्यादा जोर से मुझे पटक दिया। अब इससे धरती पर नुकसान हुआ है तो इसमें मेरी क्या गलती है। उल्टे मुझे जोर से गिरने पर जो चोट लगी है उन चोटों का हर्जाना बादलों से लेना चाहिए। और अंत में वर्षारानी ने कह दिया "करे कौन ओर भरे कौन"?

 

              बादल क्या बोले?

 

     बात तो सही है। वर्षारानी की बात सुनकर तत्काल जज ने बादलों को अदालत में पेश होने का फरमान जारी कर बुलाया गया। बादलों ने अपने बचाव पक्ष में कहा कि यह सब समुद्र के कारण हुआ है। समुद्र ने हमे अधिक मात्रा में जल वाष्प दे दिया। हम इसे सम्हाल नहीं पाए और अधिक वर्षा हो गई। इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। बादलों ने भी कह दिया "करें कौन ओर भरे कौन"?

   

           समुद्र बरी हो गया

   

      जज ने सुना और मन ही मन कहा कि बात तो सही है। अब तत्काल बादलों की बात सुनकर समुद्र को हाजिर किया गया। जवाब तलब किया गया और कहा गया कि क्यों न आपको अधिक जल वाष्प उत्पन्न करने से, सघन बादल बनने व अधिक वर्षा होने से धरती पर हुई तबाही का गुनहगार माना जाकर सजा दी जाये। तब समुद्र ने अपने जवाब में कहा कि इसमें मेरी कोई गलती नहीं है, यह तो सूर्य की गर्मी का प्रभाव है। यदि सूर्य की गर्मी न होती तो जल वाष्प नहीं बनता। न जल वाष्प से बादल बनते और न बादलों से वर्षा होती। न वर्षा होती, न धरती पर तबाही मचाई जाती। अतः श्री मान जी इस घटना का असली जिम्मेदार सूर्य है। समुद्र ने भी कह दिया "करें कौन और भरे कौन"?

 

                सूरज को शक से क्यों देखा?

 

     सभी सूर्य की और शक की निगाहों से देखने लगे। तभी सूर्य देव बोल उठे गर्मी देना तो मेरा स्वभाव है। यह गुण तो मुझे स्वयं भगवान ने मुझे बनाते समय से दिया है। अतः इसके लिए तो स्वयं भगवान सृष्टि कर्ता जिम्मेदार है। सूर्य ने भी कह दिया "करें कौन ओर भरे कौन"?

     तब सभी शक की निगाहों से भगवान की ओर देखने लगे। और सभी जोर-जोर से चिल्लाने लगे 'भगवान तुमने ऐसा क्यों किया?'

 

               कैसे न्याय हुआ?

 

     तभी शांत भाव से भगवान बोले " मानव ध्यान से सुनो, जो करेगा वही भरेगा"। इसमें न तो वर्षा रानी की गलती है, न बादलों की गलती है। और न समुद्र व सूर्य की गलती है। गलती है तो आप मानव की गलती है। आप लोगों को मैंने सभी प्राकृतिक संसाधन सन्तुलित रूप में दिए थे किंतु आप लोगों ने इनका अनुचित ढंग से दुरुपयोग किया जिसके कारण यह आपदा आप लोगों पर आई। आपने जंगलों को नष्ट किया। इसी का परिणाम अति वृष्टि हुई। इस कारण आपके जन व धन का नाश हुआ।

 

                  दोषी कौन?

 

     अतः आप लोगों की ही गलती से यह हुआ है। वास्तविक अपराधी तो आप स्वयं हो। सजा तो आप लोगों को ही मिलनी चाहिए। और सच माने तो इसकी सजा आपदा के रूप में आप को मिल भी चुकी है। इस प्रकार न्याय हुआ।

     अतः सावधान अगर आप आगे से भी इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से बचना चाहते हैं तो आपको प्राकृतिक संसाधनों का उचित ढंग से उपयोग करना होगा। वृक्षारोपण करना होगा। वनों को बचाना होगा।

 



     

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