कालुराम शर्मा जिन्हें पक्षियों से प्यार था


मेरे लिए रायबिडपूरा का एक आकर्षण जहाँ शिक्षक मित्र हैं, उनसे मिलना हमेशा ताजगी भर देता हैं. वहीँ गौरैया का कलरव मुझे आनंदित करता है. कस्बे में आपको यहाँ-वहां गौरैया की हलचल दिखाई देती है. लोग-बाग गलियों से गुजरते रहते हैं लेकिन ये बिना भय के कलरव करते हुए उछल-कूद मचाती रहती है. गौरया पालतू पक्षी नहीं है. इनकी एक अलग ही श्रेणी है जिसे अंग्रेजी में synanthropic कहा जाता है. इसके लिए हिंदी में कोई कारगर शब्द नहीं मिला. गूगल के शब्दकोष में इसका अर्थ भी नहीं है. 
लिहाजा, गौरैया गली में चुगती रहती हैं. नर और मादा की जुगलबंदी और मस्ती यहाँ वाकई में देखने को मिलती है. गौरेया घरों की दीवारों में इंटों के बीच में जो छेद हैं उनमें किस कदर पनाह पाती है, घर के हिस्सों में ही घोंसला बना लेती है, इसका अनुमान आप चित्रों से लगा सकते हैं. ऐसा शहरों में कहाँ! 
गौरैया का मानव के साथ सहभोजिता का रिश्ता रहा है। लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व मनुष्यों ने जब मध्य-पूर्व में खेती प्रारंभ की उसी समय गौरैया ने मानव के साथ रिश्ता बिठाना शुरू किया। लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व खेती के फैलाव के साथ-साथ गौरैया भी तेज़ी से फैलती गई। हालांकि घरेलू गौरैया की कई उपप्रजातियां हैं लेकिन जेनेटिक विश्लेषण से पता चलता है कि ये हाल ही में अलग-अलग हुई हैं।
गौरैया दिवस पर इसकी चिंताएं जताई जाती है. असल में गौरेया का आवास तो हमारे घर ही हैं. शहर से गौरेया के गायब होने की प्रमुख वजह इनके आवास का उजड़ना है. 
इस पर कुछ महीनों पहले मैंने एक लेख लिखा था जो एकलव्य की स्रोत नामक विज्ञान पत्रिका में देखा जा सकता है. 


पहले फोटो को फुल स्क्रीन करके देखना श्रेयस्कर होगा.

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